तू पढता चल, तू बढता चल
- Mast Culture

- Oct 10, 2025
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By Vaishnavi Holey
है कोष जग उमड़ पड़ा,
तू कर निकट ज़रा धरा ।
समय गगन है जो अचल,
तू शब्द-बाण बना प्रबल ।
तू पढ़ता चल, तू बढ़ता चल ।
जो विश्व अनंत से है घिरा,
अक्षर-संग्राम का डेरा |
आशय आरंभ कर सरल,
विचार-मंथन न हो विरल ।
तू पढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
अखंड ध्यास - श्वास तरल,
अजेय हो जो था विफल।
हक नहीं तेरा मलाल,
प्रतीक्षा में विजय-गुलाल ।
तू पढ़ता चल, तू बढ़ता चल।
By Vaishnavi Holey



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