श्रीकृष्ण प्रणभंग
- Mast Culture

- Jul 9, 2025
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By Suyash S. Gaikwad
महाभारत का युद्ध चला,
होगए है आठ दिन,
नौवे दिन का ये प्रसंग,
है बडा संगीन। (1)
(नौवे दिन कि सुबह,)
दुर्योधन भीष्म के कक्ष मे आया,
हुआ दोनो मे संवाद,
पक्शपात कर रहे हो महामहीम,
पांडवो को जीवनदान होगा आपका अपराध। (2)
यदि आपमे ना हो सामर्थ्य,
या फिर पांडव है आपके अति प्रीय,
तो मित्र कर्ण को बनाओ सेनापती,
वो करेगा पांडवों को निष्क्रीय। (3)
पितामह बोले,
हे कुरू युवराज, एसे तीखे शब्द,
वासुदेव है उनकी ढाल,
शस्त्र नही उठाएंगे वे,
अब तुम संभालो अपना भौकाल। (4)
हे दुर्योधन, निश्चिंत रहो तुम,
संसार को मेरा यह प्रण सुनाउगा,
या तो पांडू पुत्रों की चिताए जलेगी,
या हरी से शस्त्र उठ्वाउगा। (5)
रणभूमी मे एकत्र हुए सब,
शंखनाद से गूंजती धर्ती,
क्या होगा अब आगे,
कोन होगा आज स्वर्गलोक मे भर्ती। (6)
भीष्म पितामह लिए आँखों मे ज्वाला,
आए करने रणभूमी मे तांडव,
दृढ निश्चय कर आए है,
क्या उनके हाथों आज मरेंगे पांडव? (7)
दुर्योधन पितामह को देखता,
श्वेत रूप मे कुरुवंश के संत,
उसकी अपेक्षा बढ रही,
की वे करेंगे इस युद्ध का अंत। (8)
वीर अभिमन्यु के तीर जैसे,
अग्नि उगलते सर्प लागे,
कौरव सेना का विनाश कर रहे,
एसा पुत्र पाके अर्जुन के भाग जागे। (9)
दुर्योधन, द्रोण और सुशर्मा आदि,
सभी अर्जुन पर टूट पडे,
सभी को एकत्र आते देख,
अर्जुन से वायुअस्त्र छूट पडे। (10)
सभी पांडव थे व्यस्त कही,
भीष्म पहुचे युधिष्ठिर के पास,
वह पकडा गया तो होगा युद्ध समाप्त,
यही था उनका यथाशक्ति प्रयास। (11)
अर्जुन और भीम पहुँचे,
करने युधिष्ठिर को सहाय,
पितामह का वध करना ही है,
अब उनका अंतिम पर्याय। (12)
दोनो तरफ के महारथी,
प्राण हथेली पर रखते,
लड रहे जी-जान से,
एक दूसरे का सामर्थ्य परखते। (13)
रक्त कि नदियाँ बेहे रही,
मानो पी रहा हो इसे काल,
इस युद्ध के पश्चात पडने वाला था,
आर्यवर्त मे महावीरों का अकाल। (14)
हुआ सब महारथियों मे,
युद्ध एक घमासान,
किंतु पितामह के हाथों,
जा रहे थे सबके प्राण। (15)
पांडव सेना को भागते देख,
अर्जुन से बोले गिरधारी,
सत्य बनाओ अपने वचन,
क्योंकि संकट है हमपे भारी। (16)
अर्जुन मुह लट्काए खडा रहा,
पितामह से युद्ध का समय था ये,
दिल पर पत्थर रखके बोला,
हे माधव, पितामह कि ओर चलिए। (17)
पितामह और अर्जुन थे आमने-सामने,
दोनो लिए आँखों मे अग्नि अपार,
युद्ध आरंभ हुआ दोनो मे,
दोनो के रक्त से हुआ कुरुक्षेत्र का श्रृंगार। (18)
अर्जुन के थे हात कांप रहे,
कैसे करे अपने पितामह पर प्रहार,
उसके सारे बाण जाए विफल,
मानो दे रहा हो उन्हे उपहार। (19)
श्रीकृष्ण हुए अत्यंत क्रोधित,
पार्थ से यह अपेक्षा थी नही उनकी,
क्या हुआ पार्थ? पुछा उन्होंने,
देखके यह दशा उसकी। (20)
वे बोले,
इतना समझाया तुम्हे,
किंतु तुम अब भी हो मोह बद्ध,
तुम नही करोगे तो मै करुगा,
पितामह भीष्म का वध। (21)
श्रीकृष्ण कूदे रथ से नीचे,
रूप था उनका अति वक्र,
कोई और शस्त्र ना उठाकर,
उठाया उन्होंने एक टूटे रथ का चक्र। (22)
लेहराता हुआ पीतांबर उनका,
जैसे मेघों मे विद्युत का नृत्य,
उनके हातो मे चक्र मानो,
सहस्त्र दल कमल लागे सत्य। (23)
रथ का चक्र लिए सर पर,
श्रीकृष्ण खडे रणांगण मे सज कर,
दौडे वह पितामह की ओर,
जैसे एक सिंघ वार करे गज पर। (24)
हरी ने शस्त्र उठाया,
पितामह का प्रण हुआ साकार,
मानो हो ये सतयुग,
श्रीकृष्ण धरे नरसिंह अवतार। (25)
(पितामह प्रणाम करके बोले)
हे नारायण, मेरी मृत्यु हेतु
प्रतिज्ञा आपने अपनी तोडी,
मेरे इस वृद्ध शरीर का अंत करो,
यह कृपा करो मुझपर थोडी। (26)
निशस्त्र हू मै आपके समक्ष,
बहुत हुआ प्रतिज्ञा और प्रण का जीवन,
आज कुरुक्षेत्र मे मेरा वध करके,
मुझे मोक्ष प्रदान करे भगवन। (27)
पार्थ आश्चर्य मे मूर्ती बना,
श्रीकृष्ण को रोकने वह दौडा,
हे माधव! क्या कर रहे हो आप,
धर्म के लिए क्यों अपने प्रण का सौदा। (28)
शस्त्र ना उठाने का आपने,
दिया यह युद्ध से पूर्व वचन,
कृपया रुक जाइए वरना,
देगा संपूर्ण जग आपको लांछन। (29)
(श्रीकृष्ण बोले,)
हर एक दुनिया का,
लांछन मुझे स्वीकार है,
क्षत्रीय होकर एसी कायर्ता,
पार्थ तुमपे धिक्कार है। (30)
क्षमा प्रार्थी हू मै प्रभू,
हू मै आपका गुनहगार,
कृपया एक अवसर दीजिए मुझे,
मै करुगा सभी अधर्मियों का संहार। (31)
केवल एक अवसर दो मुझे श्याम,
अपना सर्वोत्तम सामर्थ्य दिखलाता हू,
धर्म के शत्रुओं का आज मै,
अपने बाणों से रक्त इनका सुखाता हू। (32)
हे त्रिलोकीनाथ, रुक जाओ,
स्वीकार करो यह प्रार्थना मेरी,
वचन है यह आपको मेरा,
पितामह वध मे नही होगी देरी। (33)
तब जाकर श्रीकृष्ण शांत हुए,
रथ का चक्र नीचे गिरा,
रथ पर लौटे नर-नारायण,
थामा श्याम ने लगाम का सिरा। (34)
हे पार्थ! तुम केवल तुम,
अपने कर्तव्य को सिद्ध करो,
अपने सभी विकारों का त्याग कर,
अब केवल तुम यह युद्ध करो। (35)
एक भक्त का मोह तोडा,
दूसरे के प्रण जिन्हे प्यारे,
भक्तों के लिए अपशब्द स्वीकार करे जो,
एसे है नटनागर श्याम हमारे। (36)
By Suyash S. Gaikwad



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